खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर………….

खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर
पर दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बग़ैर

मैं क्यूँकर कहूँ तुम आओ कि दिल की कशिश से वो
आयेँगे दौड़े आप मेरे घर कहे बग़ैर

क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बग़ैर

बेदर्द तू सुने न सुने लेकिन ये दर्द-ए-दिल
रहता नहीं है आशिक़-ए-मुज़तर कहे बग़ैर

तकदीर के सिवा नहीं मिलता कहीं से भी
दिलवाता ऐ “ज़फ़र” है मुक़द्दर कहे बग़ैर

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लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में …………

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में

बुलबुल को पासबाँ से न सैयाद से गिला

क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में

इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें

इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

 

इक शाख़-ए-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमाँ

काँटे बिछा दिये हैं दिल-ए-लालाज़ार में

 

उम्र-ए-दराज़ माँगके लाए थे चार दिन

दो अारज़ू में कट गए, दो इन्तज़ार में

 

दिन ज़िन्दगी के ख़त्म हुए शाम हो गई

फैला के पाँव सोएँगे कुंज-ए-मज़ार में

 

कितना है बदनसीब “ज़फ़र″ दफ़्न के लिए

दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

 

 

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